एक गाथा महारानी से पुण्यश्लोक लोकमाता बनने की, देवी अहिल्याबाई के पुण्य स्मरण दिवस पर विशेष

स्वप्निल व्यास @ इंदौर.  इतिहास-प्रसिद्ध सूबेदार मल्हारराव होलकर के पुत्र खंडेराव की पत्नी थीं, अहिल्याबाई सन १७

४५ मे अहिल्याबाई के पुत्र हुआ और तीन वर्ष बाद एक कन्या। पुत्र का नाम मालेराव और कन्या का नाम मुक्ताबाई रखा। एक बार मल्हरराव राजस्थान में चौथ वसूल करने के लिए घूम रहे थे। साथ मे खण्डेराव भी थे। बढ़ते-बढ़ते भरतपुर के पास डींग पहुंचे। वहां के जाट उनका मुकाबला करने के लिए खड़े हो गये। घनघोर युद्ध हुआ। एकाएक खण्डेराव के गोली लगी और वह वही वीरगति को प्राप्त होगये। मल्हाराव जरा दूर लड़ रहा थे। उन्हे जैसे ही यह समाचार मिला, उन पर मानो वज्रपात हो गया। लड़ाई वही समाप्त हो गईं। सुलह का झण्डा खड़ा कर दिया और वह खण्डेराव के पास पहुंचे। लडके के शव को देखकर विह्वल हो गये।

अहिल्याबाई के दु:ख का पारावार नही था। वह उनके साथ सती होने को तैयार हो गई। मल्हारराव ने उन्हें समझाते हुए कहा, “बेटी, मैं इन दो-दो दुखो को कैसे सह सकूगां? कैसे जीऊंगा? और कही मैं भी चला तो इन बच्चों को कौन संभालेगा? फिर हमने यह जो इतना राज्य फैलाया है, उसका क्या होगा? नही, जो कदम आगे बढाया है, उसे पीछे नही हटाया जा सकता। मेरे लिए तू खण्डेराव से कम नही। हम स्वराज्य के काम को बीच मे नही छोड़ सकते।’मल्हारराव एक वीर योद्धा ही नही थे, मराठा-साम्राज्य के वह एक मजबूत स्तंभ भी थे। उनकी निगाह केवल राज्य का विस्तार करने पर ही नही रहती थी, वह प्रजा के पालन मे भी उतने ही होशियार थे। युद्धो मे जहां शत्रुओ पर वह सिंह की तरह टूट पड़ते, वहां युद्ध समाप्त हो जाने के बाद एक चतुर शासक की भांति जीते हुए प्रदेश का प्रबंध करते और वहां की प्रजा को हर तरह की सुविधाएं भी देते थे। बीस बरस तक अपने महान ससुर की छत्रछाया और मार्गदर्शन में अहिल्याबाई ने इन गुणों को पूरी तरह ग्रहण कर लिया था। यही नहीं, स्वभाव से वह बड़ीधार्मिक थी और परमार्थ से उन्हे बहुत प्रेम था। इन सब गुणो के मिल जाने से उनका व्यक्तित्व और भी अधिक महान बन गया।

सूबेदार मल्हारराव का २० मई १७६६ को आलमपुर (झांसी के निकट) मे देहान्त हो गया। उनके मरने के दो महीने बाद मालेराव को राजतिलक हुआ। राजतिलक के कुछ ही महीने बाद मालेराव अचानक बीमार पड़े और सन १७६७ मे उनकी मृत्यु होगई। अहिल्याबाई ने अपने-आपको संभाला और बड़ी मजबूती से उन्होने शासन का सूत्र अपने हाथो मे ले लिया। प्रजा के लोग तो यह चाहते ही थे, क्योकि वे उनके गुणो से परिचित थे।

शासन की बागडोर जब अहिल्याबाई ने अपने हाथ मे ली, राज्य में बड़ी अशांति थी। चोर, डाकू आदि के उपद्रवों से लोग बहुत तंग थे। ऐसी हालत मे उन्होने देखा कि राजा का सबसे पहला कर्त्तव्य उपद्रव करनेवालों को काबू मे लाकर प्रजा को निर्भयता और शांति प्रदान करना है। उपद्रवों में भीलों का खास हाथ था। उन्होने दरबार किया और अपने सारे सरदारों और प्रजा का ध्यान इस ओर दिलाते हुए घोषणा की—”जो वीर पुरूष इन उपद्रवी लोगो को काबू मे ले आवेगा, उसके साथ मैं अपनी लड़की मुक्ताबाई की शादी कर दूंगी।”

इस घोषणा को सुनकर यशवंतराव फणसे नामक एक युवक उठा और उसने बड़ी नम्रता से अहिल्याबाई से कहा कि वह यह काम कर सकता है। महारानी बहुत प्रसन्न हुई। यशंवंतराव अपने काम मे लग गये और बहुत थोडे समय मे उन्होंने सारे राज्य मे शांति की स्थापना कर दी। महारानी ने बड़ी प्रसन्नता और बड़े समारोह के साथ मुक्ताबाई का विवाह यशवंतराव फणसे से कर दिया।उनका सारा जीवन वैराग्य, कर्त्तव्य-पालन और परमार्थ की साधना का बन गया। भगवान शकंर की वह बड़ी भक्त थी। बिना उनके पूजन के मुंह में पानी की बूंद नही जाने देती थी। सारा राज्य उन्होने शंकर को अर्पित कर रखा था और आप उनकी सेविका बनकर शासन चलाती थी।”संपति सब रघुपति के आहि”—सारी संपत्ति भगवान की है, इसका भरत के बाद प्रत्यक्ष और एकमात्र उदाहरण शायद वही थीं। राजाज्ञाओं पर हस्ताक्षर करते समय अपना नाम नही लिखती थी। नीचे केवल श्रीशंकर लिख देती थी। उनके रूपयो पर शंकर का लिंग और बिल्व पत्र का चित्र अंकित है ओर पैसो पर नंदी का। तब से लेकर भारतीय स्वराज्य की प्राप्ति तक इंदौर के सिहासन पर जितने नरेश उनके बाद मे आये सबकी राजाज्ञाएं श्रीशंकर आज्ञा जारी नही होती, तब तक वह राजाज्ञा नही मानी जाती थी ओर उस पर अमल नही होता था।
अहिल्याबाई एक राज्य की महारानी थी ओर इस कारण प्राप्त कर्तव्यों का पालन वह बड़ी होशियारी के साथ करती थी। परंतु स्वभाव से वह एक भक्त और साध्वी नारी थी। उनका चित्त हमेशा भगवान के चरणो मे लगा रहता और इनके संपूर्ण चिंतन का विषय यही रहता कि दीन-दुखियों का कष्ट दूर कैसे हो तथा भक्तजन निश्चित होकर भगवतचिंतन किस प्रकार कर सकें। इस हेतु महेश्वर मे नित्य दान, धर्म, पुराण, कीर्तन होते रहते थे। उनके कुल-देवता भगवान मल्लारि (कृष्ण) और मार्तण्ड (सूर्य) थें, परंतु उनकी अपनी लौ भगवान शंकर के चरणो में लगी रहती थी। रोज सैकड़ो ब्राह्मण पूजा मे लीन रहते, जिन्हे प्रतिदिन अन्नसत्र मे भोजन करवाया जाता। राज्य के सारे मुख्य-मुख्य मंदिरों में भजन, पूजन, कीर्तन ओर पुराणों के नियमित पाठ का प्रबंध उनकी तरफ से रहता था और इन सबके खर्च से वह करती रहती। यही नही, राज्य के बाहर जितने भी प्रमुख हिंदू तीर्थ थे, प्राय: उन सभी स्थानों पर मंदिर, घाट, अन्न-सत्र पूजन कीर्तन आदि कोई-न-कोई पारमार्थिक प्रवृत्ति उनकी ओर से आज तक जारी है। काशी, प्रयाग, गया, जगन्नाथपुरी, द्वारका, रामेश्वर, बदरी-केदार, हरिद्वार, मतलब यह कि ऐसे हर तीर्थ मे उन्होने कोई-न-कोई पवित्र काम किया है।

अहिल्याबाई का घरेलू जीवन बहुत ही दुखमय रहा। युवावस्था के प्रारभ मे ही पति वियोग हो गय। उसके बाद ससुर चले गये। फिर पुत्र भी छोड़कर चला गया। केवल लड़की-दामाद बच गये थे ओर उनका एक बच्चा था नत्थू। बच्चे को सदा अपने पास रखती ओर बहुत प्यार करती। नत्थू का उन्होने विवाह कर दिया ओर उसे धीरे-धीरे राज-काज की शिक्षा देने लगी। परंतु वह एकाएक बीमार हो गया ओर चल बसा।

मुक्ताबाई ओर यशवंतराव का एक एकमात्र बच्चा था। उसकी मृत्यु से उनकी सारी आशाओं पर पानी फिर गया। वे इतने शोक-विह्वल हो गये कि फिर संभल न सके। पिता यशवंतराव का ३ दिसम्बर सन १७९१ को मृत्यु हो गई। मुक्ताबाई नर्मदा के तट पर अपने पति के साथ सती हो गई। राज्य की चिंता का भार और उस पर प्राणो से भी प्यारे लोगो का वियोग। इस सारे शोक-भार को अहिल्याबाई का शरीर अधिक नही संभाल सका। १३ अगस्त सन १७९५ को उनकी जीवन-लीला समाप्त हो गई।

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