भगवा स्पेस सूट पहनकर अंतरिक्ष में जाएंगे भारतीय

नई दिल्ली: इससे ये साफ़ हो गया है कि निकट भविष्य में भारत अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने में सक्षम होगा. इसलिए क्योंकि यही रॉकेट भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर जाएगा. भारत के भविष्य के अंतरिक्ष यात्री को ‘गैगानॉट्स या व्योमैनॉट्स’ का नाम भी दिया गया है. भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों स्पेस में भेजने के कार्यक्रम के लिए इसरो ने भारत सरकार से 15000 करोड़ रुपये के आवंटन की मांग की है. फिलहाल भविष्य के अंतरिक्ष यात्रियों के ‘स्पेस सूट’ तैयार कर लिए गए हैं.

इस रॉकेट की लंबाई 140 फ़ीट है और वज़न 200 हाथियों जितना. यानी 640 टन. इसी लिए इसे ‘दानवाकार रॉकेट’ की संज्ञा दी गई है. भारत को अभी तक 2300 किलोग्राम से ज़्यादा के वजन वाले संचार उपग्रहों के प्रक्षेपण लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था. इस सैटेलाइट को तैयार करने में ‘इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाईजेशन’ यानी इसरो के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को 15 साल लगे जिसमे भारत में ही विकसित किया गया क्रायोजेनिक इंजन लगाया गया है. इस इंजन के लिए ‘लिक्विड ऑक्सीजन’ और ‘हाइड्रोजन’ को ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. इस विशालकाय रॉकेट का यात्री भी एक विशालकाय संचार उपग्रह ‘जीसैट-19’ है. इस संचार उपग्रह का वज़न भी 3136 किलोग्राम है. इस उपग्रह को अहमदाबाद स्थित ‘स्पेस एप्लीकेशन सेंटर’ यानी एसएसी में निर्मित किया गया है. यानी भारी भरकम टैक्सी का भारी भरकम पैसेंजर. स्पेस ऐप्लिकेशन सेंटर के निदेशक तपन मिश्रा का कहना है, ‘सही मायने में यह ‘मेड इन इंडिया’ उपग्रह डिजिटल इंडिया को सशक्त करेगा.’इस रॉकेट का निर्माण भी विदेशों की तुलना में काफ़ी किफायती रहा है. ‘GSLV मार्क-III-D1’, 4000 किलोग्राम तक के पेलोड को लेकर जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (भूतुल्यकालिक अंतरण कक्षा) तक ले जाने और 10 हजार किलो तक के ‘पेलोड’ को पृथ्वी की निचली कक्षा में पहुंचाने की ताक़त रखता है. भारत 2022 तक एक महिला और दो पुरुषों को अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी कर रहा है. इसके लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने रूपरेखा भी तैयार कर ली है. यह भारत का पहला मानवयुक्‍त अंतरिक्ष अभियान होगा. गगनयान नाम से शुरू होने वाले अंतरिक्ष अभियान में तीनों ही भारतीय अंतरिक्ष यात्री एक सप्‍ताह तक अंतरिक्ष में रहेंगे. मंगलवार को यह जानकारी अंतरिक्ष एवं परमाणु ऊर्जा राज्‍यमंत्री जितेंद्र सिंह और इसरो के चेयरमैन के शिवन ने दी. बता दें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्‍त को इस अभियान की घोषणा की थी.

आजादी की 75वीं वर्षगांठ से पहले मिलेगी उपलब्धि

इसरो के चेयरमैन के शिवन ने बताया कि तीनों अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में करीब सात दिनों तक रहेंगे. इसके बाद चालक दल तीनों अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर गगनयान के जरिये अरब सागर, बंगाल की खाड़ी या जमीन के किसी हिस्‍से पर उतर सकता है. उन्‍होंने कहा कि यह उपलब्धि देश की आजादी की 75वीं वर्षगांठ से छह महीने पहले ही हासिल कर ली जाएगी.

राकेश शर्मा से लेंगे मदद

के शिवन ने कहा है कि इस अभियान के लिए देश के पहले अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा से भी मदद ली जा सकती है. बता दें कि राकेश शर्मा पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री थे, जो 1984 में रूस के सोयुज टी-11 अंतरिक्ष यान से अंतरिक्ष गए थे. 2022 में अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले तीनों अंतरिक्ष यात्रियों का चयन भारतीय वायुसेना और इसरो संयुक्‍त रूप से करेंगे. माना जा रहा है कि इस अभियान में पायलटों या इंजीनियरों को शामिल किए जाने पर जोर रहेगा. अंतरिक्ष यात्रियों के चयन के बाद उन्‍हें दो से तीन साल तक ट्रेनिंग दी जाएगी.

चौथा सफल देश होगा भारत

इसरो के मुताबिक सात टन वजनी, सात मीटर ऊंचे और करीब चार मीटर के व्‍यास की गोलाई वाले गगनयान को जीएसएलवी एमके3 के जरिये अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया जाएगा. प्रक्षेपित करने के बाद यह 16 मिनट में कक्षा में पहुंच जाएगा. गगनयान को पृथ्‍वी की सतह से 300-400 किमी की दूरी वाली कक्षा में स्‍थापित किया जाएगा. अगर भारत अपने इस मानवयुक्‍त अभियान में सफल होता है तो हम उन अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथे सफल देश बन जाएंगे. इसरो ने यह भी बताया कि इस मानवयुक्‍त अंतरिक्ष अभियान की तैयारी 2004 से चल रही थी.

जनवरी में चंद्रयान-2 होगा लॉन्‍च

भारत अगले साल यानी 2019 में जनवरी में अपना महत्‍वाकांक्षी अभियान चंद्रयान-2 लॉन्‍च कर सकता है. योजना के अनुसार भारत चंद्रयान 2 को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचाएगा. ऐसा करने वाला भारत विश्‍व का पहला देश बनकर इतिहास रच देगा. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चेयरमैन के सिवन ने मंगलवार को इस अभियान की जानकारी देते हुए बताया ‘जनवरी 2019 में हम अपने बड़े अभियान चंद्रयान-2 को जीएसएलवी एमके-3-एम1 से लॉन्‍च करेंगे.’इसरो चेयरमैन ने कहा ‘हमने इस अभियान के लिए पूरे देश के विशेषज्ञों से समीक्षा करवाई और उनके विचार जाने. उन सभी ने हमारे कार्य की सराहना की और कहा कि यह इसरो के लिए अब तक का सबसे जटिल अभियान है.’

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