मन में है आत्मविश्वास की कमी और सता रहा है असफलता का डर तो करें बस यह एक काम, हनुमान जी….

इस दुनिया में हर व्यक्ति को जीवन में कभी ना कभी किसी चीज़ का डर लगता ही है। कई लोग भूत-प्रेत से डरते हैं तो कई लोग ग़रीबी से डरते हैं। कई लोग इस दुनिया की भीड़ में खो जाने से डरते हैं तो वहीं कई लोग लोगों से डरते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो किसी चीज़ से नहीं डरते हैं, लेकिन असफल होने से डरते हैं। ज़्यादातर लोगों के मन में असफलता का डर बैठा होता है। असफलता का डर लोगों को अंदर-अंदर से खोखला कर देता है और वह हर काम को करने से पहले डरते हैं, जिसकी वजह से उन्हें सफलता नहीं मिल पाती है।

असफलता के डर की वजह से ही व्यक्ति हर समय यह सोचता रहता है कि उसका काम कभी पूरा नहीं होगा। लेकिन ऐसा नहीं होता है अगर व्यक्ति सच्चे मन से अपना काम करे तो उसमें उसे सफलता ज़रूर मिलती है। हालाँकि किसी भी काम को करने में कठिनाई का सामना ज़रूर करना पड़ सकता है, लेकिन अगर लगान सच्ची हो और मेहनत से काम किया जाए तो असफलता का सवाल ही नहीं उठता है। अगर आप भी उन्ही लोगों में से हैं जो असफलता से डरते हैं तो आज हम आपको एक असै उपाय बताने जा रहे हैं, जिससे आपके मन का यह डर हमेशा के लिए दूर हो जाएगा।

कलयुग में सबस एजल्दी पुकार सुनते हैं हनुमान जी:

जी हाँ जिन लोगों को जीवन में असफलता का डर सताता है उन लोगों को सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए। इससे आपकी सभी मुश्किलें हमेशा के लिए दूर हो जाएँगी। सुंदरकांड के पाठ से व्यक्ति के अंदर आत्मविश्वास बढ़ता है और हनुमान जी की कृपा से हर काम में सफलता मिलने लगती है। हनुमान जी को कलयुग में सबसे जल्दी पुकार सुनने वल देवता कहा जाता है। इसी वजह से कलयुग में सबसे ज़्यादा लोग हनुमान जी की पूजा करते हैं, हनुमान जी के भक्त मंगलवार के दिन उनकी पूजा अर्चना करते हैं।

जानिए सुंदरकांड की कुछ ख़ास बातें:

*- आपको बता दें रमचरित मानस में सुंदरकांड की कथा सबसे अलग है। पूरे रमचरित मानस में हर जगह केवल श्रीराम का गुणगान किया गया है, लेकिन सुंदरकांड ही एक ऐसा अध्याय है, जिसमें सिर्फ़ हनुमान जी का गुणगान किया गया है।

मनोवैज्ञानिक नज़रिए से देखा जाए तो यह आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला अध्याय है। इसमें ऐसी-ऐसी बातें लिखीं हैं, जिनको पढ़ने के बाद व्यक्ति को मानसिक शक्ति की प्राप्ति होती है। इससे किसी भी काम में सफलता पानें के लिए आत्मविश्वास मिलता है।

*- सुंदरकांड को हनुमान जी की सफलता के लिए याद किया जाता है। अक्सर लोग यह कहते हैं कि आख़िर श्रीरामचरित मानस के पाँचवे अध्याय का नाम सुंदरकांड ही क्यों रखा गया है।

जब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका गए थे। उन्होंने देखा कि लंका त्रिकुटाचल पर्वत पर स्थित है। वहाँ तीन पर्वत थे। पहला सुबैल था जहाँ मैदान में युद्ध हुआ था। दूसरा नील पर्वत जहाँ सभी राक्षसों के घर बने हुए थे और तीसरा सुंदर पर्वत जहाँ पर अशोक वाटिका बनी हुई थी। इसी वाटिका में रावण ने माता सीता को रखा था। यहीं हनुमान जी माता सीता से मिले थे। यह इस अध्याय की सबसे मुख्य घटना थी, इस वजह से इसका नाम सुंदरकांड रखा गया।

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