दिवाली से भी ज्यादा महत्व है गजलक्ष्मी व्रत का, इस दिन खरीदा सोना बढ़ता है 8 गुना

पंडित विशाल जोशी के अनुसार यह व्रत 29 को मनाया जाना उचित है, क्योंकि श्राद्ध पक्ष में 26 को कोई भी तिथि मान्य नहीं हुई है अत: 27 को षष्ठी व सप्तमी आधे-आधे दिन है। 27 तारीख को सप्तमी का श्राद्ध माना गया है उस हिसाब से और उदया तिथि के अनुसार 29 सितंबर को पर्व मनाया जाना सही होगा…

श्राद्ध पक्ष में यूं तो शुभ कार्य वर्जित होते हैं। नई वस्तुएं खरीदना, नए परिधान पहनना भी निषेध होता है। लेकिन इन 16 कड़वे दिनों में अष्टमी का दिन विशेष रूप से शुभ माना गया है। श्राद्ध पक्ष में आने वाली अष्टमी को लक्ष्मी जी का वरदान प्राप्त है। यह दिन विशेष इसलिए भी है कि इस दिन सोना खरीदने का महत्व है। मान्यता है कि इस दिन खरीदा सोना आठ गुना बढ़ता है। साथ ही शादी की खरीदारी के लिए भी यह दिन उपयुक्त माना गया है। इस दिन हाथी पर सवार मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है। इस व्रत को दिवाली से ज्यादा मान्यता दी जाती है।

जानिए पूजन की सरल विधि

शाम के समय स्नान कर घर के देवालय में एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर केसर मिले चन्दन से अष्टदल बनाकर उस पर चावल रख जल कलश रखें।- कलश के पास हल्दी से कमल बनाकर उस पर माता लक्ष्मी की मूर्ति प्रतिष्ठित करें। मिट्टी का हाथी बाजार से लाकर या घर में बना कर उसे स्वर्णाभूषणों से सजाएं। नया खरीदा सोना हाथी पर रखने से पूजा का विशेष लाभ मिलता है। श्रद्धानुसार चांदी या सोने का हाथी भी ला सकते हैं।चांदी के हाथी का कई गुना अधिक महत्व है। स्वर्ण हाथी से भी अधिक… अत: संभव हो तो चांदी का हाथी अवश्य खरीदें।- माता लक्ष्मी की मूर्ति के सामने श्रीयंत्र भी रखें। कमल के फूल से पूजन करें।- इसके अलावा सोने-चांदी के सिक्के, मिठाई, फल भी रखें।- इसके बाद माता लक्ष्मी के आठ रूपों की इन मंत्रों के साथ कुंकुम, अक्षत और फूल चढ़ाते हुए पूजा करें-

– ॐ आद्यलक्ष्म्यै नम:- ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:- ॐ सौभाग्यलक्ष्म्यै नम:- ॐ अमृतलक्ष्म्यै नम:- ॐ कामलक्ष्म्यै नम:- ॐ सत्यलक्ष्म्यै नम:- ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:- ॐ योगलक्ष्म्यै नम:- इसके बाद धूप और घी के दीप से पूजा कर नैवेद्य या भोग लगाएं।- महालक्ष्मी जी की आरती करें।

पूजन करते समय इस दीपक को जलाएं तथा कथा पूरी होने तक दीपक जलते रखना चाहिए। अखंड ज्योति का एक और दीपक अलग से जलाकर रखें। पूजन के पश्चात इन्हीं 16 पूड़ी को सिवैंया की खीर या मीठे दही से खाते हैं। इस व्रत में नमक नहीं खाते हैं। इन 16 पूड़ी को पति-पत्नी या पुत्र ही खाएं, अन्य किसी को नहीं दें। मिट्टी का एक हाथी बनाएं या कुम्हार से बनवा लें जिस पर महालक्ष्मी जी की मूर्ति बैठी हो।

सायंकाल जिस स्थान पर पूजन करना हो, उसे गोबर से लीपकर पवित्र करें। रंगोली बनाकर बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर हाथी को रखें। तांबे का एक कलश जल से भरकर पटे के सामने रखें। एक थाली में पूजन की सामग्री (रोली, गुलाल, अबीर, अक्षत, आंटी (लाल धागा), मेहंदी, हल्दी, टीकी, सुरक्या, दोवड़ा, दोवड़ा, लौंग, इलायची, खारक, बादाम, पान, गोल सुपारी, बिछिया, वस्त्र, फूल, दूब, अगरबत्ती, कपूर, इत्र, मौसम का फल-फूल, पंचामृत, मावे का प्रसाद आदि) रखें। केल के पत्तों से झांकी बनाएं।

maha lakshmi and kuber will remain on these zodiac signs

संभव हो सके तो कमल के फूल भी चढ़ाएं। पटे पर 16 तार वाला डोरा एवं ज्वारे रखें। विधिपूर्वक महालक्ष्मीजी का पूजन करें तथा कथा सुनें एवं आरती करें। इसके बाद डोरे को गले में पहनें अथवा भुजा से बांधें। भोजन के पश्चात रात्र‍ि जागरण तथा भजन-कीर्तन करें। दूसरे दिन प्रात:काल हाथी को जलाशय में विसर्जन करके सुहाग-सामग्री ब्राह्मण को दें।

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