बेहद रहस्मयी है कामाख्या मंदिर, इसका सच जानकर आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे

इस दुनिया में कईं हजारों जगहें ऐसी हैं, जिनके अंदर कोई ना कोई गहरा राज़ छिपा हुआ है. सदियों से लोग ऐसी जगहों को भूतिया जगह मानते आएं हैं. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि इन रहस्यमयी जगहों पर ज्यादतर लोग जाने से कन्नी कतराते हैं. इसके पीछे की वजह उनका डर होता है. डरावने और रहस्मयी किलों या घरों के बारे में तो आपने सुना ही होगा.

मगर क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान कोई मंदिर भी रहस्मयी हो सकता है? अगर नहीं तो दोस्तों, आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जो अपने आप में ही बेहद मायावी और रहस्मयी है. ये मंदिर दरअसल भारत में ही मौजूद है. इस मंदिर को लोग कामाख्या मंदिर के नाम से जानते हैं.

कामाख्या मंदिर असम की राजधानी दिसपुर के पास गुवाहाटी से ८ किलोमीटर दूर कामाख्या में है। कामाख्या से भी १० किलोमीटर दूर नीलाचल पव॑त पर स्थित हॅ। यह मंदिर शक्ति की देवी सती का मंदिर है। यह मंदिर एक पहाड़ी पर बना है. व इसका महत् तांत्रिक महत्व है। प्राचीन काल से सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है। पूर्वोत्तर के मुख्य द्वार कहे जाने वाले असम राज्य की राजधानी दिसपुर से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नीलांचल अथवा नीलशैल पर्वतमालाओं पर स्थित मां भगवती कामाख्या का सिद्ध शक्तिपीठ सती के इक्यावन शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है। यहीं भगवती की महामुद्रा (योनि-कुण्ड) स्थित है।

शक्तियों का होता है प्रदर्शन

कामाख्या मंदिर के अम्बुबासी मेले के दौरान तांत्रिक शक्तियों को काफी महत्व दिया जाता है. यहां सैकड़ों तांत्रिक अपने एकांतवास से बाहर आते हैं और अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं. यह तांत्रिक मेले के दौरान लोगों को वरदान देने के साथ-साथ उनकी सहायता भी करते हैं. ऐसा माना जाता है कि कोई भी व्यक्ति जब तक पूरन तांत्रिक नहीं बन जाता तब तक वह कामाख्या देवी के सामने माथा ना टेके वरना इससे देवी नराज़ हो सकती है.

पशुओं की दी जाती है बलि – कामाख्या मंदिर

हालांकि पशुओं की बलि देना देश में वर्जित है परंतु यहां बकरे और भैंस की बलि देना आम बात है. पशुओं की बलि देकर और भंडारा करने के बाद ही कामाख्या देवी प्रसन्न होती हैं. इस मंदिर में जाने से हर प्रकार के काले जादू और श्राप से छुटकारा मिल जाता है. विश्व के सभी तांत्रिकों, मांत्रिकों एवं सिद्ध-पुरुषों के लिये वर्ष में एक बार पड़ने वाला अम्बूवाची योग पर्व वस्तुत एक वरदान है।

यह अम्बूवाची पर्वत भगवती (सती) का रजस्वला पर्व होता है। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार सतयुग में यह पर्व 16 वर्ष में एक बार, द्वापर में 12 वर्ष में एक बार, त्रेता युग में 7 वर्ष में एक बार तथा कलिकाल में प्रत्येक वर्ष जून माह में तिथि के अनुसार मनाया जाता है। इस बार अम्बूवाची योग पर्व जून की 22, 23, 24 तिथियों में मनाया गया।

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