गीता में दिए गए इन गुणों को अपनाने से आप भी बन सकते है -सफल

शास्त्रों की बात करें, तो जान लें कि धर्म के साथ हमारे ऋषि-मुनियों और धर्मग्रंथों ने संकल्प को एक अचूक साधन बताया है, जिसके आधार पर सभी मामलों में सफलता प्राप्त की जा सकती है।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘असंभव शब्द किसी व्यक्ति विशेष के शब्दकोष में नहीं है। लक्ष्य प्राप्ति में ध्यान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संकल्प जितना मजबूत होगा, अभ्यास उतना ही गहरा और फलदायी होगा। “शास्त्रों में कहा गया है:” अमन्त्रमाक्षरम नस्ति-नस्ति मूलनौसाधम। अयोग्य: पुरुषो नास्ति योजनाशास्त्र दुर्लभ:। ‘

यानी ऐसा कोई अक्षर नहीं है जो मंत्र न हो। ऐसा कोई पौधा नहीं जो औषधि न हो। ऐसा कोई आदमी नहीं है जो योग्य न हो। हर शब्द में एक मंत्र है, उसे जगाने की कोई न कोई क्षमता जरूर होनी चाहिए। हर पौधे में अमृत जैसा रसायन होता है, इसे पहचानने के लिए समझदारी चाहिए। क्षमता व्यक्ति में अंतर्निहित होती है, लेकिन उस क्षमता का उपयोग करने के लिए विवेक होना चाहिए।

साधनों को लक्ष्य से जोड़कर मनुष्य अपनी क्षमताओं का भरपूर लाभ उठा सकता है। दृढ़ संकल्प और साधना से मनुष्य भी मनुष्य से नारायण बन सकता है। अभिमान, अहंकार, असीमित इच्छाएं मनुष्य को राक्षस बना सकती हैं और इस प्रकार वे उसके पतन का कारण हैं।

इसीलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने जीवन में सत्संग, सात्विकता, सरलता, संयम, सत्य जैसे दिव्य गुणों को स्थापित करके निरंतर अभ्यास और अभ्यास करने का उपदेश दिया। संयम का पालन करने से साधना में लगा हुआ व्यक्ति निश्चित रूप से अपना सर्वांगीण विकास प्राप्त करता है। —शिवकुमार गोयल

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