कालसर्प दोष दूर करता है यह मंदिर, दर्शन मात्र से दूर हो जाता है प्रभाव

यूं तो कुडली में कई तरह के योग बनने की बातें सामने आती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कुंडली में एक ऐसा योग भी होता है, जो होता तो योग हैं, लेकिन इनमें प्रभाव दोष का होता है। ऐसा ही एक योग है कालसर्प योग, जिसे सामान्यत: कालसर्प दोष भी कहते हैं।यह एक ऐसा योग होता है, जिसके धनात्मक प्रभाव कम और ऋणात्मक प्रभाव अधिक देखने को मिलते है। ज्योतिष के जानकार सुनील शर्मा के अनुसार ये एक ऐसा योग है, जो आपको कभी संतुष्ट ही नहीं होने देता। यानि लगातार और ज्यादा और ज्यादा की ओर आकर्षित करता जाता है। एक ओर जहां ये कुछ स्तर तक तो लाभ का कारण बनता है, वहीं इसके बाद ये अति की स्थिति में आकर नुकसान का कारण बनना शुरू हो जाता है।इसके अलावा भी इसके कई असर हैं, जो नकारात्मक प्रभाव देते हैं। जैसे- इनमें माना जाता है कि जो भी व्यक्ति इससे प्रभावित है, उसे जीवन में कई प्रकार की परेशानियों तथा उलझनों का सामना करना पड़ता है।

how to become free from KAALSARP DOSH

वहीं दोष का प्रभाव आपके नौकरी, विवाह, संतान, सम्मान, पैसा और भी कई समस्याओं से संबंधित हो सकता हैं। ऐसे में हर कोई जिस पर भी इस योग का प्रभाव होता है वह इससे छुटकारा पाना चाहता है।पंडित शर्मा के अनुसार कुंडली में कालसर्प योग हो तो कई ज्‍योत‍िषीय उपाय करने पड़ते हैं। लेकिन क्‍या आप जानते हैं क‍ि अगर ये सारे उपाय न भी क‍िये जाएं तो भी कुछ ऐसे तरीके हैं जिनकी मदद से कालसर्प दोष दूर हो सकता है।

जी हां आज हम आपको एक ऐसे तीर्थस्‍थल के बारे में बता रहे हैं, जिसके संबंध में मान्यता है कि यहां दर्शन मात्र से ही यह दोष दूर हो जाता है। यूं तो कालसर्प दोष निवारण के लिए नासिक का त्रयंबकेश्वर मंदिर सबसे अधिक प्रसिद्ध है, लेकिन उत्तर भारत में भी एक ऐसा मंदिर मौजूद है जिसके संबंध में मान्‍यता है क‍ि नागपंचमी के द‍िन इस मंदिर में दर्शन करना चाहिए। यानि क‍ि ब‍िना क‍िसी ज्‍योत‍िषीय उपाय के भी कालसर्प दोष दूर हो जाता है। आइए जानते हैं कौन सा है यह मंदिर…

कालसर्प दोष दूर करने वाले ज‍िस मंद‍िर की हम बात कर रहे हैं वह उत्‍तर प्रदेश के प्रयागराज में स्‍थाप‍ित है। यह मंदिर दारागंज मोहल्‍ले के उत्‍तरी छोर पर स्थित है। यहां नागराज वासुकी मंदिर के देवता के रूप में विद्यमान हैं। मंदिर का नाम भी नागराज वासुकी मंदिर है। बता दें क‍ि यह मंदिर दूसरे मंदिरों से बेहद खास अहमियत रखता है। यही वजह है कि दर्शनार्थी दूर-दूर से इस मंदिर में नागराज के दर्शनों के लिए आते हैं।

मंदिर के पुजारी बताते हैं क‍ि नागराज वासुकी मंदिर में जातक स्‍वयं पूजा-पाठ का सामान ले जाकर काल सर्प दोष से मुक्ति पा सकते हैं। इसके लिए पूजा विधि भी बताई जाती है।इसके तहत सबसे पहले प्रयाग के संगम में स्‍नान कर लें, फिर वासुकी नाग मंदिर में मटर, चना, फूल, माला और दूध के साथ जाए। इसके बाद वासुकी नाग के दर्शन करके यह सामग्री उन्‍हें अर्पित करते हुए उनसे काल सर्प दोष दूर करने की प्रार्थना करें।

गंगा की धारा नागराज वासुकी के फन पर गिरी…

पुराणों के अनुसार देवी गंगा स्वर्ग से गिरीं तो वह पृथ्वी लोक से पाताल लोक में चली गईं। वहां उनकी धारा नागराज वासुकी के फन पर गिरी। इससे ही इस स्‍थान पर भोगवती तीर्थ का निर्माण हुआ। इसके बाद नागराज वासुकी और शेष भगवान पाताल लोक से चल कर वेणीमाधव का दर्शन करने प्रयाग गए।कहा जाता है जब वह प्रयाग गए तो भोगवती तीर्थ भी प्रयाग आ गया। यही वजह है कि इस स्‍थान को नागराज वासुकी के साथ भोगवती तीर्थ का वास भी माना जाता है। यहां मंदिर से पूर्व की ओर गंगा के पश्चिमी हिस्‍से में भोगवती तीर्थ है। बारिश के मौसम में जब गंगा में बाढ़ आती है तो इसका जल मंदिर की सीढ़‍ियों तक पहुंच जाता है। कहा जाता है कि उस समय जो भी श्रद्धालु वहां स्‍नान करते हैं उन्‍हें भोगवती तीर्थ का लाभ मिलता है।कथा मिलती है कि मराठा के एक राजा हुए जिन्‍हें कुष्‍ठ रोग हो गया था। उन्‍होंने नाग वासुकी के मंदिर में मन्‍नत मांगी कि यदि उनका कुष्‍ठ रोग ठीक हो गया तो वह मंदिर का जीर्णोद्धार कराएंगे। इसके बाद कुछ ही वक्‍त में राजा कुष्‍ठ रोग से मुक्‍त हो गए। तब उन्‍होंने नाग वासुकी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। इसके अलावा उन्‍होंने मंदिर के साथ ही पक्‍के घाट का निर्माण कराया।

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