जुमे के दिन बीवी के साथ ह’म’बिस्त’री करने की फ़ज़ीलत, अगर आप जान गये तो…

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अस्सलाम वालेकुम मेरे प्यारे भाइयों और बहनों उम्मीद करता हूं कि आप सब खैरियत से होंगे मेरे भाइयों आज मैं लाया हूं आपके लिए एक ऐसे सवाल का जवाब द जो बहुत सारे लोग जानना चाहते हैं और पूछना चाहते हैं और जिसके बारे में मैं भी बहुत वक्त से बताना चाहता था। दोस्तों बहुत सारे लोगों को गलतफहमी है जुम्मे की रात यानी कि जब सुबह जुम्मा हो उससे पहले बीवी के साथ ह’म’बिस्त’री नहीं करना चाहिए या नहीं? क्योंकि यह जुम्मा और जुम्मेरात के बीच की रात होती है इसलिए बहुत सारे लोग इसके बारे में अफवाहें फैला रहे हैं.

ऐसी अफवाह वही लोग फैला रहे हैं जो कि दीन से दूर है। मेरे भाइयों बहुत सारे लोग सवाल पूछते हैं कि ग़ुस्ल ए जनाबक क्या है? मेरे भाइयों आज मैं इसी बात से जुड़ी एक हदीस के बारे में बताने जा रहा हूं. सही बुखारी की हदीस नंबर 880। ये एक इंटरनेशनल नंबरिंग है उसे आप याद कर ले.

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इस हदीस में नबी ए करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने कहा है कि जो शख्स जुम्मा के दिन ग़ुस्ल ए जनाबत करके नमाज पढ़ने जाए तो गोया उसने एक ऊंट की कुर्बानी दी, अगर वह अव्वल वक्त में मस्जिद पहुंचा तो उसने एक गाय की कुर्बानी दी और जो तीसरे नंबर पर मस्जिद में पहुंचा उसने सींग वाले मेंडे की कुर्बानी दी ,जो चौथे नंबर पर पंहुचा उसने एक मुर्गे की कुर्बानी दी और जो पांचवें नंबर पर मस्जिद में पहुंचा उसने एक अंडे की कुर्बानी दी.

लेकिन जब इमाम बाहर आ जाते हैं खुतबा पढ़ने के लिए तो उस वक्त सारे फरिश्ते खुतबा सुनने में मशरूफ हो जाते हैं। इस हदीस में 4 पॉइंट बिल्कुल क्लियर किए गए हैं जिस में सबसे पहले तो ग़ुस्ल ए जनाबत की बात की गई है आप लोग सोच रहे होंगे कि अब ये गुस्ल ए जनाबत क्या है?

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मेरे भाइयों गुस्ल ए जनाबत तभी होता है जब किसी शख्स ने जुमा से पहले वाली रात में बीवी के साथ ह’म’बिस्त’री की होगी और फिर उसने जुम्मे का ग़ुस्ल किया हो। ज्यादातर जुम्मे रात और जुम्मे के बीच की जो रात होती है और जो बंदे समझदार है वह फजिर की नमाज से पहले अपनी बीवी के साथ ह’म’बिस्त’री कर सकते हैं फिर ग़ुस्ल ए जनाबत करते हैं। अगर आम ग़ुस्ल किया जाता है तो उस पर एक ऊंट की कुर्बानी का सवाब नहीं मिलता है लेकिन ग़ुस्ल ए जनाबत करके जुम्मा की नमाज पढ़ने पर एक ऊंट की कुर्बानी का सवाब मिलता है। बात यह है कि यह अफवाह हदीसों से टकराती है.

यहां पर मैं एक और बात आपको बताना चाहूंगा कि जब इमाम खुतबा के लिए बाहर आते हैं तो फरिश्ते खुतबा सुनने में मशरूफ हो जाते हैं लेकिन आपने ज्यादातर देखा होगा कि हमारे यहां के लोग घरों से निकलते ही उस वक्त हैं जब खुतबा शुरू हो जाता है। ऐसे वक्त में मस्जिद जाना जबकि फरिश्ते खुतबा सुन रहे हो उस वक्त आपको वह सवाब नहीं मिल पाता है जो खुतबे से पहले मस्जिद पहुंचने पर मिलता है क्योंकि फरिश्ते तो खुतबा सुनने में लग जाते हैं और वह आपके सवाब लिखते नहीं है.

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