भगवान शिव ही हैं रचेता, ब्रह्मा और विष्णु के बारे में जानें खास बातें

हिंदू धर्म में 18 पुराण हैं. सभी पुराण हिंदू भगवानों की कहानियां बताते हैं. कुछ समान बातों के अलावे सभी कुछ हद तक अलग-अलग कहानियां बयां करते हैं. इसमें त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के जन्म के साथ ही देवताओं की भी कहानियां सम्मिलित हैं. वेदों में भगवान को निराकार रूप बताया है जबकि पुराणों में त्रिदेव सहित सभी देवों के रूप का उल्लेख होने के साथ ही उनके जन्म की कहानियां भी हैं.

भगवान शिव को पूरे विश्व में सबसे बड़ा देवों के देव महादेव माना जाता है क्योंकि उनके बारे में यह कहा जाता है कि ना ही इस दुनिया में उनके जैसा कोई था। और ना ही आने वाले समय में उनके जैसा कोई आने वाला है दुनिया के संरक्षण के लिए भगवान शिव अपने भक्तों से सब से जल्द प्रसन्न हो जाते हैं और उन्हें उनका मनचाहा वरदान दे देते हैं उन्हें केवल भक्तों के मन में सच्चे धर्म और निष्ठा का भाव नजर आता है वह उसके सहयोग गुणों को दरकिनार कर उसकी अच्छाइयों को देखते हुए उसको कर्मफल दे देते हैं। सावन में पूरे माह उन्हें विशेष रूप से पूजा जाता है। सावन में इस बार कुल 5 सोमवार आएंगे। दो सोमवार इस सावन माह के बीत चुके हैं और शिव जी के भक्त अब सावन माह के तीसरे सोमवार के आने की प्रतीक्षा कर रहें हैं। आइये ऐसे में इस सावन माह में आज हम आपको शिवपुराण के माध्यम से बताते हैं कि इस दुनिया में शिव जी ब्रह्मा जी और विष्णु जी से भी कैसे श्रेष्ठ हैं ?

शिवपुराण में यह उल्लेखित है कि एक बार शिव जी और ब्रह्मा जी में इस तरह का विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन हैं ? ऐसे में दोनों खुद को श्रेष्ठ साबित करने में लग गए। तब ही एक विराट ज्योतिर्मय लिंग दोनों के समक्ष प्रकट होता है। इसके बाद ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने यह निश्चय किया कि जो भी इसके छोर का पता लगाएगा वहीं श्रेष्ठ होगा।

ब्रह्मा जी और विष्णु जी दोनों ही विपरीत दिशा में ज्योतिर्मय लिंग के छोर का पता लगाने लगे। विष्णु जी इससे हारकर लौट आए और ब्रह्मा ने असत्य का सहारा लेते हुए कहा कि वे छोर का पता लगाने में सफल रहें और केतकी के फूल को उन्होंने इसमें साक्षी बताया। ब्रह्मा जी के असत्य वचन सुनते ही शिव जी प्रकट हुए और वे ब्रह्मा जी की आलोचना करने लगे। विष्णु जी और ब्रह्मा जी दोनों ही हाथ जोड़कर शिव जी की स्तुति करने लगे। महादेव ने दोनों ही देवताओं से कहा कि मैं ही इस दुनिया का कारण, उत्पत्तिकर्ता और स्वामी हूं। साथ ही शिव जी ने यह भी कहा कि मैं ही आप दोनों देव का रचयिता भी हूं।

भगवान शिव को ‘संहारक’ और ‘नव का निर्माण’ कारक माना गया है. अलग-अलग पुराणों में भगवान शिव और विष्णु के जन्म के विषय में कई कथाएं प्रचलित हैं. शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव को स्वयंभू (सेल्फ बॉर्न) माना गया है जबकि विष्णु पुराण के अनुसार भगवान विष्णु स्वयंभू हैं. शिव पुराण के अनुसार एक बार जब भगवान शिव अपने टखने पर अमृत मल रहे थे तब उससे भगवान विष्णु पैदा हुए जबकि विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्मा भगवान विष्णु की नाभि कमल से पैदा हुए जबकि शिव भगवान विष्णु के माथे के तेज से उत्पन्न हुए बताए गए हैं. विष्णु पुराण के अनुसार माथे के तेज से उत्पन्न होने के कारण ही शिव हमेशा योगमुद्रा में रहते हैं. शिव के जन्म की कहानी हर कोई जानना चाहता है. श्रीमद् भागवत के अनुसार एक बार जब भगवान विष्णु और ब्रह्मा अहंकार से अभिभूत हो स्वयं को श्रेष्ठ बताते हुए लड़ रहे थे तब एक जलते हुए खंभे से जिसका कोई भी ओर-छोर ब्रह्मा या विष्णु नहीं समझ पाए, भगवान शिव प्रकट हुए.

विष्णु पुराण में वर्णित शिव के जन्म की कहानी शायद भगवान शिव का एकमात्र बाल रूप वर्णन है. यह कहानी बेहद मनभावन है. इसके अनुसार ब्रह्मा को एक बच्चे की जरूरत थी. उन्होंने इसके लिए तपस्या की. तब अचानक उनकी गोद में रोते हुए बालक शिव प्रकट हुए. ब्रह्मा ने बच्चे से रोने का कारण पूछा तो उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि उसका नाम ‘ब्रह्मा’ नहीं है इसलिए वह रो रहा है. तब ब्रह्मा ने शिव का नाम ‘रूद्र’ रखा जिसका अर्थ होता है ‘रोने वाला’. शिव तब भी चुप नहीं हुए. इसलिए ब्रह्मा ने उन्हें दूसरा नाम दिया पर शिव को नाम पसंद नहीं आया और वे फिर भी चुप नहीं हुए. इस तरह शिव को चुप कराने के लिए ब्रह्मा ने 8 नाम दिए और शिव 8 नामों (रूद्र, शर्व, भाव, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव) से जाने गए. शिव पुराण के अनुसार ये नाम पृथ्वी पर लिखे गए थे.

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