वोह औरत जो अपने ससुराल और शौहर की ब’दना’मी करती है? मौ’लाना ने बताया वो औरत…

अस्सलाम वालेकुम मेरे प्यारे भाइयों और बहनों अक्सर लोग सवाल करते हैं कि ऐसी बहुत सारी औरतें होती हैं जिनके पास घर बहुत सारी सहुलतें होती हैं लेकिन फिर भी वह बाहर जाकर अपने शौहर की बुराई करती हैं। आज समाज की बहुत बड़ी बुराई है इसमें कोई एक नहीं बल्कि मैं आप और बड़े छोटे सब शामिल हैं

आइए मैं आपको बताता हूं की शुरुआत कहां से होती है इस सब की।लड़की जब अपने घर से विदा होकर ससुराल जाती है उस वक्त मां बाप को चाहिए कि उसे नसीहत करें कि बेटी शौहर का मर्तबा बहुत ऊंचा है लेकिन हमारे यहां जल्दी कोई नसीहत नहीं करता है बल्कि माँ बाप बेटी को मशवरे देता है कि बेटी अगर कोई कुछ भी कहे तो हमें बताना हम देख लेंगे.

एक बार मेरे उस्ताद की बेटी की शादी हुई और उन्होंने उसे एक नसीहत की उन्होंने इतनी अच्छी नसीहत की अपनी बेटी को कि लोगों ने कहा कि इसे लिख लीजिए और बाद में उस नसीहत को लेकर एक किताब भी छापी गई जिसका नाम था “एक बाप की बेटी के नाम नसीहत “। उन्होंने अपनी बेटी से कहा था कि बेटी ससुराल में कामकाज तुम्हारी बुलंदी होगी यह कोई कमी नहीं है। उन्होंने अपनी बेटी से यह भी कहा कि अपने शौहर की सभी जरूरतों को पूरा करना तुम पर वाजिब है और फर्ज है भले ही इसमें तुम को कोई तकलीफ क्यों ना हो

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इसी तरह हमारे नबी के जमाने में और उससे पहले भी लड़कियों को नसीहत की जाती थी ।जब वह विदा होकर ससुराल जाती थी। लेकिन आज के जमाने में नसीहतें नहीं दी जाती है अब लोग अपनी बेटियों को मशवरे देते हैं लोग कहते हैं कि जाओ हम उनसे ज्यादा भारी खानदानल वाले हैं देखता हूं क्या कर लेते हैं वह लोग। और यह सब एक या दो लोग नहीं कर रहे हैं बल्कि पूरा मांशरा इसमें शामिल है। होना ऐसा चाहिए कि जब बेटी की शादी हो तो मां और बाप दोनों उसको नसीहत करें की बेटी अगर तुम को ससुराल में कोई दिक्कत होती है तो शरीयत के मुताबिक है की तुम्हारे लिए वह तकलीफ तकलीफ नहीं होगी.

अब निकाह के बाद तुम्हारा शौहर ही तुम्हारे लिए सब कुछ है पलट कर अब तुम हमें मत देखना ।अल्लाह के बाद अब दुनिया में तुम्हारा सहारा तुम्हारा शौहर ही है और अब के जमाने में कहा जाता है कि बेटा मैं बस तुम्हारा निकाह कर रहा हूं बाकी तो मैं जिंदा हूं जब तक रहूंगा तुम मुझसे सब कुछ बताना और लड़की भी खुशी-खुशी कहती है कि अच्छा अब्बा मैं तुम्हें जरूर बताऊँगी। जबकि उस बाप को अपनी बेटी से यह कहना चाहिए कि बेटा अब वही तुम्हारा घर है और तुम्हारा शौहर ही तुम्हारे लिए सब कुछ है.

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अल्लाह के बाद तुम्हारा शौहर है। शोहर के बाद उसके मां बाप और उसके बाद कभी हमारा नंबर आता है। आज के बाप ये कहते हैं कि बेटा मैंने तुमको पढ़ाया लिखाया इसलिए है ताकि तुम अपने घर ज़ुल्म न सहो।जब तुम्हारा शोहर तुम पर जुल्म करे तो उससे कह देना कि मैं पढ़ी-लिखी हूं और मैं तुम्हें छोड़कर जा सकती हूं। मेरे दोस्तों मेरे भाइयों आप ही बताएं कि क्या ऐसा माहौल बनाकर और ऐसे मशवरे देकर क्या हम अपनी बेटियों के घर को बसाए रख सकते हैं। तो पहली गलती होती है मां बाप से जो बेटी को नसीहत की जगह मशवरे देते हैं दूसरी गलती तब होती है.

जब बेटी विदा होकर ससुराल जाती है और वलीमें के दिन ही उसे लोग वापस लेकर चले आते हैं हालांकि ऐसा होना नहीं चाहिए लेकिन यह गलत भी नहीं है इसलिए उसे घर ला सकते हैं और घर लाते ही सारी औरतें लड़की को घेर कर बैठ जाती हैं और पूछने लगती है कि क्या हुआ कैसे हुआ तुम्हारी सास कैसी है तुम्हारी नंद कैसी है किसी ने तुम को ताना तो नहीं मारा। सच पूछो तो आज के जमाने में लोग लड़के लड़कियों को इस तरह से भड़काते हैं.

जैसे कि कोई मैच या बॉक्सिंग का खेल शुरू होने वाला है कि जाओ और सामने वाले की धज्जियां उड़ा दो निकाह से पहले ही लोग लड़के और लड़कियों को भड़काने लगते हैं और इसी वजह से कई बार मियां बीवी के रिश्ते खराब हो जाते हैं और इन्ही सब गलतियों की वजह से ही लडकिया अपने शौहर और ससुराल की बुराई करना शुरू कर देती है जबकि उनको इस्लाम के बारे मे कोई जानकारी नहीं होती है.

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